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काव्य या साहित्य को पढने-सुनने या देखने से जो आनंद मिलता हैउसे रस कहा जाता है!
रस के अवययो और अंगो पर प्रकाश डालिए!                                          
रस-निष्पति के तिन प्रमुख अवयय है-
1.भाव 
2.विभाव
3.अनुभाव

1.भाव                                                                            
मन के विकारो या आवेगों को भाव कहते है! ये दो प्रकार के होते है-                           
 1.स्थायी भाव
2.व्यभिचारी या संचारी भाव

स्थायी भाव-ये प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थित होते है! कोई भी मनुष्य इनसे 
वंचित नहीं है! ये संख्या नौ है-                                                               
रतिउत्साहविस्मयहासशोकक्रोधभयजुगुप्साबैराग्य!

स्थायी भाव
रस
1.रति
श्रृंगार
2.उत्साह
वीर
3.वैराग्य
शांत
4.शोक
करुण
5.क्रोध
रौद्र
6.भय
भयानक
7.घृणा
वीभत्स
8.बिस्मय
अद्भुत
9.हास
हास्य
10.वत्सलता
वात्सल्य

व्यभिचारी या संचारी भाव: ये संख्या में 33 होते है! ये मनोभाव स्थायी ना होकर चंचल होते है
तथा बुलबुलों की तरह उठाते गिरते रहते है! कुछ प्रमुख संचारी भाव निम्न है-
शंकाजड़ताचिंताउग्रताहर्षगर्व आदि!

2.विभाव
विभाव का अर्थ है- भावो के कारण! जिन विषय-प्रस्तुतियों के द्वारा मन के स्थायी भाव 
जाग्रत होते हैउन्हें विभाव कहते है!                                                           
विभाव के तिन अंग है- 
आश्रयआलंबन और उधीपन   

1.आश्रय: जिनके ह्रदय में भाव जागते हैउन्हें आश्रय कहते है! ये दो प्रकार के होते है- 

1.विभव के अंग:जैसे कहानी में राम को देखकर सीता के मन में प्रेम की अनुभाती हुई! 
इसमें सीता आश्रय है! सीता के ह्रदय में प्रेम जाग्रत हुआ! सीता आश्रय विभव है!
2.सहृदय का ह्रदय:कहानी या काव्या को पढनेसुनने या देखने वाला भी आश्रय है! उसके 
ह्रदय में सभी  भाव जाग्रत होते है!

2.आलंबन:जिस प्रमुख व्यक्तिवास्तु को देखकर ह्रदय में भाव जागता हैउसे आलंबन कहते है!

3.उधीपन:जिन प्रेरक व्यक्तियों के सहयोग से नुल भाव जागने में सहायता मिलीउन्हें उधीपन कहते है!

3.अनुभाव:
आश्रय की चेस्ठावो को अनुभाव कहते है!

1.श्रृंगार रस-
नायक-नायिका के प्रेम को देखकर श्रृंगार रस प्रकट होता है! यह सृष्टि का सबसे व्यापक भाव है 
जो सभी में पाया जाता हैइसलिए इसे रसराज भी कहा जाता है! इसके दो प्रमुख प्रकार है-
1.संयोग श्रृंगार     2.वियोग श्रृंगार
संयोग श्रृंगार: उदाहरण-
एक पल मेरे प्रिय के दृग पलकथे उठे ऊपर सहज निचे गिर      
चपलता ने इसे विकंपित पुलक से दृढ किया मनो प्रणय सम्बन्ध था!

वियोग श्रृंगार: उदाहरण-
पीर मेरी कर रही गमगीन मुझको
और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीररानी
और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीररानी!  

2.वीर रस-
उत्साह स्थायी भाव जब विभावो अनुभावो और संचारी भावो की सहायता से पुष्ट होकर 
आस्वादन के योग्य हो जाता है तब वीर रस निष्पन होता है!
वीर चार प्रकार के मने गए है-
(1)युद्याविर
(2)दानवीर
(3)दयावीर
4)धर्मवीर    
    
इनमे युध्यविर रूप प्रमुख है!
उदाहरण-    ‘‘हे सारथे ! हैं द्रोण क्यादेवेन्द्र भी आकर अड़े,
                  
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह-भेदन कर लड़े।  

3.शांत रस-
जहा संसार के प्रति निर्वेद रस रूप में परिणत होता है वहा शांत रस होता है!
उदाहरण: ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
            
अपनी न बूझन कहै को राँडरोरू रे।।
            
मुनि-मन-अगमसुगत माइ-बापु सों।
            
कृपासिंधुसहज सखासनेही आपु सों।। 

4.करुण रस-
इष्ट की हानि का चिर वियोग अर्थ हानि शोक का विभाग अनुभाव और संचारी भावो के सहयोग 
से रस रूप में व्यक्त होता हैउसे करुण रस कहते है!
उदाहरण: 
हा सही ना जाती मुझसे
अब आज भूख की जवाला !
कल से ही प्याश लगी है
हो रहा ह्रदय मतवाला!
सुनती हु तू राजा है
मै प्यारी बेटी तेरी!
क्या दया ना आती तुझको
यह दशा देख कर मेरी!

5.रौद्र रस-
जहा विरोधी के प्रति प्रतिशोध एवं क्रोध का भाव जाग्रत होवहा रौद्र रस होता है!
उदाहरण:
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन छोभ से जलने लगे!                                         
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे!                                         
संसार देखे अब हमारे शत्रु रन में मृत पड़े!                                               
करते हुए यह घोषणा हो गए उठकर खड़े!!

6.भयानक रस-
जहा भय स्थायी भाव पुष्ट और विकशित हो वहा भयानक रस होता है!
उदाहरण:
एक ओर अजग्रही लखीएक ओर मृगराय!                                               
विकल बटोही बिच हीपरयो मूर्छा खाय!!

7.वीभत्स रस-
जहा किसी वास्तु अथवा दृश्य के प्रति जुगुप्सा का भाव परिप्रुष्ट होवहा वीभत्स रस होता है!
उदाहरण:
सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खाक निकारत!                                             
खींचत जिभाही स्यार अतिहि आनंद उर धारत!!                                           
गीध जांघि को खोदी-खोदी के मांश उपारत!                                             
स्वान अंगुरिन काटी-काटी के खात विदारत!!

8.अद्भुत रस-
आश्चर्जनक एवं विचित्र वास्तु के देखने व सुनने जब सब आश्चर्य का परिपोषण होतब अद्भुत 
रस की प्रतीति होती है!
उदाहरण:
अखील भुवन चर अचर सबहरी मुख में लखी मातु!                                     
चकित भई गदगद वचनविकशित दृग पुल्कातु!!

9.हास्य रस-
विलक्षण विषय द्वारा जहा हास्य का विस्तार एवं पोषण होवहा हास्य रस होते है!
उदाहरण:
लाला की लाली यो बोली-                                                           
सारा खाना ये चर जायेंगे!                                                             
जो बचे भूखे बैठे है                                                                
 क्या पंडित जी को खायेंगे!!

10.वात्सल्य रस-
संस्कृत आचार्यो ने केवल नौ रासो को ही मान्यता दी है! कुछ आधुनिक विद्वान वात्सल्य और
भक्ति रस को भी मानते है! उनके अनुसार-बाल-रति के आधार पर क्रमशः वात्सल्य और भक्ति 
रस का प्रकाशन होता है!
उदाहरण:
बाल दशा मुख निरखि जसोदा पुनि पुनि नन्द बुलावति!                           

अंचरा तर तै ढंकी सुर के प्रभु को दूध पियावति!!


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